
यह सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि आज का आधुनिक और चकाचौंध से भरा ‘दुबई’ कभी कानूनी रुप से ब्रिटिश भारत का ही हिस्सा था, 20वीं सदी की शुरुआत तक दुबई, कतर और बहरीन जैसे क्षेत्रों का प्रशासन दिल्ली से चलता था।
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दिल्ली से चलता था दुबई का शासन
ब्रिटिश काल के दौरान ‘इंटरप्रिटेशन एक्ट 1889’ के तहत दुबई सहित कई खाड़ी देश (Trucial States) कानूनी रुप से ब्रिटिश भारत के अधीन थे, इनका प्रशासन ‘इंडियन पॉलिटिकल सर्विस’ के अधिकारी देखते थे और वे सीधे तौर पर भारत के वायसराय (Viceroy of India) को रिपोर्ट करते थे, उस समय वहां भारतीय सेना तैनात रहती थी और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी भारत की ही थी।
भारतीय रुपया और पासपोर्ट का बोलबाला
हैरानी की बात यह है कि 1940 के दशक तक दुबई और अन्य खाड़ी क्षेत्रों में भारतीय रुपया आधिकारिक मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होता था, इतना ही नहीं, अदन (यमन) जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भारतीय पासपोर्ट तक जारी किए जाते थे। 1931 में जब महात्मा गांधी अदन पहुंचे, तो वहां के कई युवा अरब खुद को ‘भारतीय राष्ट्रवादी’ मानते थे।
वो एक फैसला जिसने सब बदल दिया
जैसे-जैसे भारत की आजादी नजदीक आई, अंग्रेजों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत खाड़ी देशों को भारत से अलग करना शुरू कर दिया।
- 1937: सबसे पहले अदन (यमन) को भारत से अलग कर एक ‘क्राउन कॉलोनी’ बनाया गया।
- 1 अप्रैल 1947: भारत की आजादी से ठीक 4 महीने पहले, अंग्रेजों ने दुबई, कुवैत और अन्य खाड़ी रियासतों को औपचारिक रुप से भारत के प्रशासनिक नियंत्रण से पूरी तरह अलग कर दिया।
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क्यों नहीं बने ये भारत का हिस्सा?
इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश अधिकारियों का मानना था कि स्वतंत्र भारत या पाकिस्तान को खाड़ी के अरब देशों की जिम्मेदारी देना ‘अनुचित’ होगा, वहीं, उस समय तक इन क्षेत्रों में तेल (Oil) के बड़े भंडारों का पता नहीं चला था, इसलिए दिल्ली में बैठे तत्कालीन अधिकारियों को लगा कि इन रेगिस्तानी इलाकों का प्रशासन संभालना भारत के लिए आर्थिक बोझ साबित हो सकता है।
1971 में मिली पूर्ण स्वतंत्रता
भारत से अलग होने के बाद ये क्षेत्र अगले 24 सालों तक सीधे लंदन (Whitehall) के नियंत्रण में रहे, अंततः 1971 में ब्रिटेन के वहां से पूरी तरह हटने के बाद ‘संयुक्त अरब अमीरात’ (UAE) का जन्म हुआ, जिसमें दुबई एक प्रमुख अमीरात बना।
अगर 1947 में वह प्रशासनिक बदलाव न हुआ होता, तो आज दुबई और उसके पड़ोसी देश भारत या पाकिस्तान की अन्य रियासतों (जैसे हैदराबाद या जयपुर) की तरह ही शामिल हो सकते थे।

















