भारत की मिट्टी तो सभी का सम्मान करने वाली है, लेकिन कुछ कोने ऐसे हैं जहां हमारे ही देशवासी कदम नहीं रख पाते। होटल हो या बीच, ये जगहें अपनी अनोखी पॉलिसी के चलते सुर्खियां बटोरती रहती हैं। पर्यावरण, सिक्योरिटी या खास कस्टमर बेस के नाम पर बने ये नियम सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

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चेन्नई का एक्सक्लूसिव हॉस्टल
तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एक छोटा सा हॉस्टल है, जो सिर्फ विदेशी बैकपैकर्स का अड्डा बन गया है। यहां पासपोर्ट दिखाओ तो बात बने, वरना दरवाजा बंद। मालिक कहते हैं, ये नये पर्यटकों को घर जैसा फील देने के लिए है, लेकिन लोकल्स के लिए ये भेदभाव जैसा लगता है। कई बार तो सोशल मीडिया पर इसकी शिकायतें वायरल हो जाती हैं।
गोवा के बीच का विदेशी राज
गोवा का नाम लेते ही बीच की तस्वीर आंखों में घूम जाती है, लेकिन अरम्बोल जैसे इलाकों में माहौल अलग है। यहां विदेशी टूरिस्ट्स को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, जबकि भारतीयों को दूर रखने की कोशिश होती है। वजह बताते हैं कि बिकिनी वाली छुट्टियां बिताने वालों को प्राइवेसी चाहिए। अनऑफिशियल नियमों ने कई बार विवाद खड़ा किया।
हिमाचल कैफे का सख्त रूल
पर्वतीय इलाके कसोल में एक पॉपुलर कैफे ने भारतीयों को बाहर का रास्ता दिखाने की वजह से हेडलाइंस में रहा। खासकर इजरायली बैकपैकर्स का फेवरेट होने के कारण ये ‘प्राइवेट जोन’ बन गया। मेनू मांगो तो मना, लेकिन विदेशी आएं तो वेलकम। लोकल अथॉरिटी ने जांच तो की, लेकिन प्रॉब्लम जस की तस बनी हुई है।
ब्रिटिश स्टाइल चेन्नई होटल
चेन्नई में ही एक और होटल है, जो पुराने ब्रिटिश जमाने की याद दिलाता है। यहां ग्राहक लिस्ट में विदेशी ही छाए रहते हैं। आईडी चेक सख्त, और भारतीयों के लिए रूम मिलना मुश्किल। कभी-कभी तो बुकिंग कैंसल कर दी जाती है। ये जगह टूरिस्ट्स के बीच हिट है, लेकिन अपने लोगों के लिए दूर की कौड़ी।
जापानी फ्लेवर वाला गुजरात रेस्टोरेंट
अहमदाबाद के एक जापानी रेस्तरां पर साफ लिखा है- लोकल्स नो एंट्री। ओनर का तर्क है कि स्टाफ जापानी कल्चर पर फोकस्ड है, हिंदी-इंग्लिश नहीं चलती। नेर्थ ईस्ट के स्टाफ को पहले तंग करने की घटनाओं ने ये पॉलिसी और सख्त कर दी। ट्रू जापानी एक्सपीरियंस के नाम पर ये चली आ रही है।
न्यूक्लियर जोन का रूसी कोना
तमिलनाडु के कुडनकुलम के पास रूसी वर्कर्स का अलग इलाका है, जो स्ट्रैटेजिक होने के कारण बंद रहता है। पुराने जमाने से बने इस कॉलोनी में एंट्री के लिए स्पेशल परमिशन चाहिए। अब पर्यटन स्पॉट बनने की बात है, लेकिन सिक्योरिटी पहले। भारतीयों के लिए ये अब भी नो-गो एरिया।
कानूनी पहलू और बहस
संविधान हर नागरिक को घूमने-फिरने की आजादी देता है, लेकिन प्राइवेट जगहों पर मालिकों के नियम चलते हैं। ये केस डिस्क्रिमिनेशन की बहस छेड़ते हैं। सरकार को ऐसे स्पॉट्स पर नजर रखनी चाहिए ताकि टूरिज्म सबका बने। आपने कभी ऐसा अनुभव किया? कमेंट में बताएं।

















