Property Rights Verdict: इंटरकास्ट शादी पर बेटी का हक खत्म हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह जानें

गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने साफ किया कि अंतरजातीय शादी से बेटी का पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध हक नहीं छिनता। 2005 संशोधन के तहत वो बेटों के बराबर हिस्सेदार है। लेकिन पिता की वैध वसीयत स्व-अर्जित संपत्ति पर उसकी मर्जी मान ली जाती है।

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supreme court decision on case related to fathers will who refused to give share to his daughter

हमारे समाज में अक्सर ये सवाल उठता है कि बेटी की शादी हो गई, खासकर अगर वो अपनी पसंद से या दूसरी जाति में हुई, तो क्या पापा की संपत्ति में उसका हक मिट जाता है? अच्छी बात ये है कि कानून अब बेटियों के साथ पूरा इंसाफ करता है। 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन ने तो साफ कर दिया कि बेटी जन्म से ही पैतृक संपत्ति की बराबर की मालिक है, लेकिन अगर पिता ने वसीयत बनाई है तो मामला थोड़ा उलझ जाता है।

जन्म से मिला बेटी का हक

सोचिए, जब बेटी पैदा होती है, उसी पल से वो परिवार की पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्सेदार बन जाती है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत वो ‘कॉपार्सनर’ कहलाती है। गुजरात हाईकोर्ट ने नवंबर 2025 में एक केस में साफ कहा कि अंतरजातीय शादी या घर छोड़ने से ये हक नहीं छिनता। एक बेटी ने 12 साल बाद दावा किया, फिर भी कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया।

गुजरात हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

अहमदाबाद की एक महिला ने दूसरी जाति के लड़के से शादी की, तो भाई-बहनों ने उसे संपत्ति से बाहर कर दिया। निचली अदालत ने पहले मना कर दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने पलट दिया। जस्टिस ने कहा, “शादी से अधिकार खत्म थोड़े ही होते हैं, ये तो जन्मसिद्ध है।” ये फैसला उन लाखों बेटियों के लिए मिसाल है जो परिवार की परंपराओं से टकरा जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की राय

लेकिन अगर पिता ने अपनी खुद की कमाई की संपत्ति पर वसीयत बनाई है, तो बात अलग है। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसलों में दोहराया कि वैध वसीयत को कोर्ट आसानी से नहीं तोड़ सकता। अगर पिता ने जानबूझकर बेटी को बाहर किया, तो वो उसकी इच्छा मानी जाती है खासकर स्व-अर्जित प्रॉपर्टी पर। विनीता शर्मा केस (2020) ने पैतृक संपत्ति पर तो बराबरी दी, लेकिन वसीयत के मामले में पिता की मर्जी भारी पड़ती है।

पैतृक बनाम स्व-अर्जित संपत्ति

साफ फर्क समझ लीजिए:

  • पैतृक संपत्ति (दादा-परदादा वाली): यहां बेटी का हक शादी से नहीं जाता। बंटवारा हो तो बराबर हिस्सा।
  • स्व-अर्जित संपत्ति (पिता की खुद की कमाई): वसीयत बने तो पिता जैसा चाहे वैसा बांट सकता है। बेटी चुनौती दे सकती है, लेकिन कोर्ट वैध वसीयत नहीं बदलता।

क्या करें अगर हक छिन जाए?

अगर आपको लगे कि आपका हिस्सा रोका जा रहा है, तो पहले वकील से बात करें। दस्तावेज जमा कर सिविल कोर्ट जाएं। वसीयत हो तो उसकी वैधता साबित करनी पड़ेगी जैसे गवाह, मेंटली फिटनेस। समय सीमा भी देखें, ज्यादातर केस में 12 साल तक दावा कर सकती हैं। परिवार में बातचीत से भी सुलझा लें, कोर्ट आखिरी रास्ता है।

समाज के लिए बड़ा संदेश

ये फैसले बताते हैं कि कानून अब बेटियों को कमजोर नहीं मानता। शादी हो या न हो, जाति कुछ भी हो, हक वही रहेगा। लेकिन वसीयत जैसी चीजें परिवारों को सतर्क रखती हैं। पिता-पुत्री के रिश्ते में संपत्ति से ऊपर भावनाएं रखें, फिर सब सुखी रहेंगे। ये बदलाव महिलाओं को मजबूत बना रहे हैं।

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indsocplantationcrops

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