
देश में दशकों पुरानी मांग को पूरा करते हुए केंद्र सरकार ने 2026 से जाति आधारित जनगणना कराने का रोडमैप तैयार कर लिया है, यह कदम भारत की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था (Reservation System) में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव ला सकता है, ताजा अपडेट्स के अनुसार, इस जनगणना के बाद ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) की सूची का पूर्ण पुनर्गठन होना तय है।
Table of Contents
OBC लिस्ट में क्यों होगा बदलाव?
वर्तमान में OBC आरक्षण 1931 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, जो अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। 2026 की जनगणना से प्राप्त सटीक डेटा के आधार पर:
- नई जातियों का प्रवेश: कई राज्यों (जैसे ओडिशा और महाराष्ट्र) ने अपनी स्थानीय पिछड़ा वर्ग सूची (SEBC) की दर्जनों जातियों को केंद्रीय OBC लिस्ट में शामिल करने की सिफारिश की है।
- अप्रासंगिक जातियों की विदाई: वे जातियां जो पिछले दशकों में सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न हो चुकी हैं, उन्हें ‘क्रीमी लेयर’ या अन्य मानकों के आधार पर सूची से बाहर किया जा सकता है।
आरक्षण पर सीधा असर: 50% की सीमा टूटेगी?
जाति जनगणना का सबसे बड़ा प्रभाव आरक्षण के कोटे पर पड़ेगा:
- कोटा बढ़ाने की मांग: कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों के सर्वेक्षणों ने संकेत दिया है कि OBC आबादी 50% से अधिक हो सकती है, ऐसे में वर्तमान 27% कोटे को आबादी के अनुपात में बढ़ाने का दबाव बढ़ेगा।
- उप-वर्गीकरण (Sub-categorization): रोहिणी आयोग की सिफारिशों के अनुरूप, OBC के भीतर ‘अति पिछड़ों’ के लिए अलग कोटा बनाया जा सकता है, ताकि आरक्षण का लाभ कुछ प्रभावशाली जातियों तक ही सीमित न रहे।
महत्वपूर्ण तारीखें और प्रक्रिया (Census Schedule)
गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन के अनुसार, यह प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न होगी:
- पहला चरण (1 अक्टूबर, 2026): उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे पहाड़ी राज्यों में शुरुआत होगी।
- दूसरा चरण (1 मार्च, 2027): शेष भारत में व्यापक स्तर पर जनगणना और जातियों की गिनती की जाएगी।
डिजिटल होगी यह जनगणना
आजादी के बाद की यह पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें मोबाइल ऐप का उपयोग किया जाएगा, इससे डेटा की सटीकता बढ़ेगी और जातियों के वर्गीकरण में होने वाली त्रुटियों को कम किया जा सकेगा।
2026 की यह जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के नए युग की शुरुआत मानी जा रही है हालांकि, जातियों को जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया राजनीतिक रुप से संवेदनशील हो सकती है, जिसका सीधा असर भविष्य के चुनावों पर पड़ेगा।

















