
देश की सर्वोच्च अदालत ने आरक्षण और नियुक्तियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) का कोई भी छात्र अपनी योग्यता (Merit) के बल पर सामान्य श्रेणी के कट-ऑफ को पार करता है, तो उसे ‘अनारक्षित’ (General) सीट पर ही नियुक्ति दी जाएगी।
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योग्यता का सम्मान: कोटे से ऊपर होगी मेरिट
जस्टिस की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित कोटा केवल ‘न्यूनतम गारंटी’ है यदि इन वर्गों के मेधावी छात्र सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के बराबर या उनसे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, तो उन्हें आरक्षण की सीमा में नहीं बांधा जा सकता, कोर्ट के अनुसार, ऐसे मेधावी छात्रों का चयन सामान्य सीटों पर होना चाहिए, ताकि आरक्षित कोटे की सीटें उस वर्ग के अन्य जरूरतमंद छात्रों को मिल सकें।
नियुक्ति के नियमों में बड़ा बदलाव
अदालत के इस फैसले से सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आएगा, फैसले के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:
- अब भर्ती परीक्षाओं में सबसे पहले मेरिट लिस्ट तैयार होगी। यदि मेरिट में टॉप पर रहने वाले छात्र आरक्षित वर्ग से हैं, तो वे सीधे जनरल सीट पर कब्जा करेंगे।
- आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों के जनरल सीट पर जाने से आरक्षित कोटे की सीटें खाली रहेंगी। इसका सीधा लाभ उन छात्रों को मिलेगा जो मेरिट में थोड़ा पीछे रह गए थे, क्योंकि अब उन्हें अपने कोटे की पूरी सीटें उपलब्ध होंगी।
- कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि किसी उम्मीदवार ने आयु सीमा या शुल्क जैसी किसी विशेष छूट (Relaxation) का लाभ लिया है, तो उसकी स्थिति के नियम अलग हो सकते हैं। लेकिन केवल अंक के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने वालों को जनरल श्रेणी में ही गिना जाएगा।
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सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करेगा, इससे न केवल प्रतिभा को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि आरक्षित वर्ग के उन युवाओं को भी अधिक अवसर मिलेंगे जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं।
इस फैसले के बाद अब राज्य और केंद्र सरकारों को अपनी भर्ती प्रक्रियाओं और सॉफ्टवेयर में बदलाव करना होगा ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

















