
डेनमार्क का नाम सुनते ही दिमाग में वाइकिंग्स की तलवारें और समुद्री लहरें घूम जाती हैं। वो जमाना था जब ये छोटा-सा देश यूरोप के सबसे खूंखार योद्धाओं का घर था। लेकिन समय ने करवट ली, और शीत युद्ध खत्म होने के बाद डेनमार्क ने शांति की राह पकड़ ली। कल्याणकारी राज्य की नीतियों ने लोगों को खुशहाल बनाया, मगर सैन्य ताकत पर ब्रेक लगा दिया। आज जनवरी 2026 में, दुनिया की बदलती हवा रूस का साया और अमेरिका के साथ ग्रीनलैंड पर तनाव डेनमार्क को फिर से जंग के मैदान की याद दिला रही है। ये कहानी है एक शांतिप्रिय राष्ट्र के साहसिक पुनरागमन की।
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शांतिपूर्ण नीतियों ने क्यों कमजोर किया सैन्य बल?
सोचिए, शीत युद्ध के बाद डेनमार्क ने क्या सोचा होगा? ‘अब जंग की जरूरत नहीं, चलो लोगों की भलाई पर ध्यान दें।’ यही हुआ। दशकों तक रक्षा बजट काटा गया, और फोकस आ गया वेलफेयर स्टेट पर—फ्री हेल्थकेयर, एजुकेशन, सब कुछ। नतीजा? सक्रिय सैनिकों की संख्या महज 20,000 के आसपास सिमट गई। छोटा देश ही तो है, आबादी 6 मिलियन से थोड़ी ज्यादा। अमेरिका जैसे महाशक्ति के सामने तो ये बूंद-सा लगता है। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं, डेनमार्क सोच रहा है—शांति अच्छी है, मगर खतरे से निपटने के लिए ताकत भी तो चाहिए।
अमेरिका से तुलना
2026 के ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स पर नजर डालें तो अमेरिका नंबर 1 पर राज कर रहा है, जबकि डेनमार्क 45वें पायदान पर। फर्क इतना गहरा है कि दंग रह जाएं। अमेरिका के पास टैंकों की संख्या डेनमार्क से 100 गुना ज्यादा, लड़ाकू विमान 110 गुना अधिक। रक्षा बजट? वो तो 124 गुना बड़ा है! डेनमार्क का जीडीपी छोटा है, तो बजट भी सीमित। लेकिन ये तुलना सिर्फ आंकड़ों की नहीं, सोच की भी है। अमेरिका ग्लोबल पुलिस बनने को तैयार, डेनमार्क अपनी जमीन और ग्रीनलैंड बचाने को। फिर भी, डेनमार्क अब पीछे नहीं हट रहा।
ग्रीनलैंड विवाद: जागृति का ट्रिगर
ग्रीनलैंड—डेनमार्क का वो आर्कटिक रत्न, जो बर्फीले पहाड़ों और रणनीतिक महत्व से भरा है। 2025-26 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से इसे खरीदने की बात उठाई, जिससे तनाव चरम पर पहुंच गया। ट्रंप ने कहा, ‘ये हमारे लिए जरूरी है।’ डेनमार्क ने साफ मना कर दिया—’ये हमारा है, बिकेगा नहीं।’ इस झड़प ने डेनमार्क को हिलाकर रख दिया। रूस की आक्रामकता, आर्कटिक में चीन की घुसपैठ—सब मिलाकर डेनमार्क जाग गया। अब वो सोच रहा है, वाइकिंग पूर्वजों की तरह मजबूत बनना होगा, वरना इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
बजट में क्रांति: जीडीपी का 3% रक्षा पर
सबसे बड़ा धमाका तो बजट का है। 2026 में डेनमार्क ने रक्षा खर्च को जीडीपी के 3% तक पहुंचा दिया पिछले 50 सालों का रिकॉर्ड! पहले 1.5% के आसपास था, अब दोगुना से ज्यादा। ये पैसे कहां जा रहे? नई हथियारों की खरीद पर, ट्रेनिंग पर, टेक्नोलॉजी पर। सरकार कह रही है, ‘NATO के 2% टारगेट से आगे निकलेंगे।’ ये बदलाव रूस-यूक्रेन जंग की सीख है शांति बनाए रखने के लिए ताकत चाहिए। डेनिश लोग भी अब समर्थन दे रहे हैं, क्योंकि डर सताने लगा है।
नई वायु रक्षा और F-35 का इंतजार
डेनमार्क अब हवा में राज करने को तैयार। 2026 तक पहली जमीनी आधारित वायु रक्षा प्रणाली तैनात हो जाएगी—मिसाइलें जो दुश्मन विमानों को चकमा नहीं देंगी। ऊपर से, सारे ऑर्डरेड F-35 लड़ाकू जेट्स आ जाएंगे। ये स्टील्थ फाइटर आधुनिक युद्ध का भविष्य हैं रडार से बचकर हमला करेंगे। डेनमार्क की वायुसेना मजबूत हो जाएगी, खासकर बाल्टिक सागर और आर्कटिक में। सोचिए, वाइकिंग जहाजों की जगह अब ये जेट्स लहरें काटेंगे।
अनिवार्य सेवा: 11 महीने का सैन्य प्रशिक्षण
युवाओं को मैदान में उतारने का फैसला भी कमाल का। फरवरी 2026 से कंसक्रिप्शन 11 महीने का हो गया—पहले 4 महीने था। हर फिट युवक को जाना पड़ेगा, लड़कियां भी वॉलंटरी। उद्देश्य? 20,000 से ज्यादा सक्रिय सैनिक तैयार करना। ट्रेनिंग में मॉडर्न वेपन्स, साइबर वारफेयर, आर्कटिक सर्वाइवल शामिल। डेनिश युवा पहले शायद कतराते, लेकिन अब देशभक्ति जागी है। ये कदम NATO के साथ तालमेल भी बढ़ाएगा।
वाइकिंग जज्बा फिर जागा
डेनमार्क छोटा है, लेकिन हौसला बड़ा। रूस का खतरा, ग्लोबल टेंशन, ग्रीनलैंड विवाद सबने इसे वाइकिंग ब्लड जगा दिया। 2026 में ये देश नई सैन्य ताकत के साथ उभरेगा बजट बढ़ा, हथियार आए, युवा तैयार। अमेरिका से तुलना अभी भी बेमानी है, लेकिन डेनमार्क अपनी सीमाओं की रक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। ये कहानी सिखाती है शांति की कीमत ताकत है। क्या डेनमार्क फिर से दुनिया को चौंकाएगा? वक्त बताएगा।

















