उत्तराखंड के टिहरी जिले में एक नया नियम लागू हो गया है, जो हजारों शिक्षकों की जिंदगी बदलने वाला है। जिला मजिस्ट्रेट ने शिक्षा विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि सभी शिक्षक अपने तैनाती वाले स्कूल से महज 8 किलोमीटर की परिधि में ही रहें। यह फैसला स्थानीय लोगों की शिकायतों के बाद लिया गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ाई बेहतर हो सके।
लेकिन इस आदेश ने शिक्षकों के बीच हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि कई लोग दूर के शहरों में परिवार के साथ रहते हैं और रोज लंबा सफर तय करते हैं। अब उन्हें स्कूल के पास किराए का कमरा तलाशना पड़ेगा, जिससे आर्थिक और भावनात्मक परेशानी बढ़ रही है।

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शिकायतों ने क्यों बढ़ाई मुश्किलें?
ग्रामीण इलाकों में स्कूल चलाने वाले शिक्षकों पर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि शिक्षक सुबह-सुबह 50-80 किलोमीटर दूर से आते हैं, जिससे वे थक जाते हैं। थकान की वजह से क्लासरूम में एकाग्रता कम हो जाती है और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।
कई बार बस या टैक्सी न मिलने पर देरी से पहुंचते हैं, जिससे पहली घंटी के बाद ही स्कूल शुरू होता है। जनप्रतिनिधियों ने डीएम के सामने यह मुद्दा उठाया, तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई की। नतीजा? एक लिखित आदेश, जो अब हर शिक्षक के लिए बाध्यकारी है। शिक्षक संगठन इसे अन्याय बता रहे हैं, क्योंकि परिवार को छोड़ना आसान नहीं।
रोज 80 किमी का संघर्ष
टिहरी और आसपास के ग्रामीण स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक बड़े शहरों से आते हैं। देहरादून, ऋषिकेश, पौड़ी, कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, अल्मोड़ा, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे स्थानों से लोग रोजाना सफर करते हैं। कोई अपनी निजी गाड़ी चलाता है, तो कोई सहकर्मियों के साथ टैक्सी शेयर करता है।
सुबह 5 बजे निकलते हैं, शाम को छुट्टी मिलते ही परिवार के पास लौट जाते हैं। यह व्यवस्था सालों से चल रही थी, लेकिन अब 8 किमी का दायरा तय हो गया है। ग्रामीण इलाकों में अच्छे किराए के घर ढूंढना मुश्किल है, बिजली-पानी की दिक्कतें अलग। कई शिक्षक कहते हैं कि इससे उनका मानसिक तनाव बढ़ेगा और पढ़ाई पर उल्टा असर पड़ेगा।
1981 का पुराना नियम, नया विवाद
यह कोई नया कानून नहीं, बल्कि दशकों पुराना प्रावधान है। उत्तर प्रदेश काल में 15 दिसंबर 1981 को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए जारी इस नियम में साफ कहा गया है कि कार्यस्थल से 8 किमी के दायरे में रहना अनिवार्य है। अगर बाहर रहना हो, तो विभागीय अधिकारी से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है।
उत्तराखंड बनने के बाद भी यही नियम लागू है, लेकिन अब तक शिक्षा विभाग में सख्ती नहीं हुई थी। अन्य विभागों जैसे स्वास्थ्य या पुलिस में भी यही मानक हैं, लेकिन वहां शिकायतें कम हैं। शिक्षक पूछ रहे हैं कि क्यों सिर्फ उन्हें निशाना बनाया जा रहा है? क्या ग्रामीण विकास के नाम पर व्यक्तिगत जिंदगी कुर्बान करनी पड़ेगी?
शिक्षकों की परेशानी, क्या होगा आगे?
इस आदेश से सबसे ज्यादा प्रभावित वे शिक्षक हैं, जिनके घर शहरों में हैं। बच्चों की पढ़ाई, पत्नी की नौकरी या बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल सब दांव पर लग गया। किराया चुकाने का अतिरिक्त खर्च, परिवार से दूरी और यात्रा का बोझ हटने के बजाय नया सिरदर्द। शिक्षक यूनियनें डीएम से मिलने की तैयारी कर रही हैं। वे मांग कर रहे हैं कि अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाया जाए या दूरी की सीमा बढ़ाई जाए। जिला प्रशासन का कहना है कि यह बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल वही है क्या शिक्षकों की बलिदान के बिना ग्रामीण शिक्षा सुधर सकती है?
यह फैसला उत्तराखंड के अन्य जिलों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। अगर सख्ती बढ़ी, तो हजारों परिवार बिखर सकते हैं। फिलहाल टिहरी में बहस छिड़ी हुई है, पढ़ाई सुधरेगी या जिंदगियां बिगड़ेंगी?

















