Father Property Rights: पिता की मौत के बाद कब खत्म हो जाता है बेटी का हक? हाई कोर्ट के फैसले से साफ हुआ कानून

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 1956 से पहले पिता की मौत पर बेटी को संपत्ति में कोई हक नहीं! मिताक्षरा कानून के तहत बेटे को पूरा अधिकार। सरगुजा केस में रगमानिया का दावा खारिज। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों से पुष्टि। नई पीढ़ी को 2005 संशोधन से फायदा, लेकिन पुराने मामले तय!

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chattisgarh high court rules daughter cant claim in father property if he died before this date

भाई-बहनों के बीच संपत्ति के बंटवारे को लेकर आजकल घर-घर में झगड़े आम हो गए हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो पुराने समय के मामलों में बेटियों के सपनों पर पानी फेर देगा। अगर आपके पिता की मृत्यु 1956 से पहले हो गई थी, तो बेटी उनकी संपत्ति पर दावा ठोक ही नहीं सकती। ये सुनने में कठोर लगता है, लेकिन कानून की नजर में ये बिल्कुल साफ है।

पुराना विवाद, नया ट्विस्ट

सोचिए, एक बेटी अपने पिता की याद में उनकी जमीन पर हक मांगती है, लेकिन कोर्ट कहता है – भूल जाओ बहू! सरगुजा जिले का ये केस ठीक वैसा ही है। रगमानिया ने 2005 में कोर्ट की दहलीज पर कदम रखा। उनके पिता सुधिन की मौत तो 1950-51 में ही हो चुकी थी। उन्होंने बंटवारा मांगा, मालिकाना हक की बात की। लेकिन निचली अदालत ने साफ मना कर दिया। अपील कोर्ट ने भी वही राग अलापा। आखिरकार, जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने 13 अक्टूबर को स्टैंप लगा दिया – कोई हक नहीं!

मिताक्षरा कानून की मार

अब सवाल ये कि कोर्ट ने ये फैसला कैसे दिया? जवाब है मिताक्षरा कानून। ये पुराना हिंदू कानून है, जो 1956 से पहले चलता था। इसमें साफ लिखा है कि पिता की पैतृक या खुद की कमाई की संपत्ति बेटे को ही पूरी मिलेगी। बेटी? वो तो तभी अगर कोई बेटा ही न हो। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2020 और 2022 के फैसलों का हवाला दिया। अर्शनूर सिंह बनाम हरप्रीत कौर और अरुणाचल गounder जैसे केसों में भी यही कहा गया पुराने कानून से हटना मुश्किल। बेटे बैगादास को सुधिन की सारी संपत्ति चली गई।

1956 का जादुई कानून

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 ने तो खेल ही बदल दिया। ये 17 जून को लागू हुआ। उसके बाद बेटियां भी बराबरी की दावेदार बनीं। लेकिन रेट्रोस्पेक्टिव नहीं! यानी पीछे मुड़कर नहीं देखता। अगर पिता 1956 से पहले गुजर गए, तो मिताक्षरा ही राज। स्व-अर्जित संपत्ति पर तो बेटे का पूरा कंट्रोल। कोर्ट ने ये दोहराया कि कानून वही लागू होता है, जब उत्तराधिकार खुला था। बाद के संशोधन (2005 वाला) बाद के मामलों के लिए।

बॉम्बे हाईकोर्ट की गूंज

ये अकेला केस नहीं। 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी यही कहा। वहां एक बेटी ने पिता यशवंतराव की संपत्ति मांगी, जिनकी मौत 1956 से पहले हो चुकी। कोर्ट बोला – नो वे! विधवा को हक था, बेटी को नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में एक ट्विस्ट दिया – अगर बेटा न हो तो बेटी को मिले। लेकिन ये अपवाद है, नियम नहीं। ऐसे फैसले संपत्ति विवादों को सुलझाते हैं, वरना कोर्ट में सालों लटके रहते।

आगे क्या होगा?

अब परिवार वाले सोचें – दस्तावेज चेक करो, तारीख देखो। 1956 से पहले के केसों में बेटियां मुश्किल में। लेकिन नई पीढ़ी को फायदा – 2005 संशोधन से बेटियां कोपार्सिनर बनीं। बराबर हक! ये फैसला कानून की मर्यादा दिखाता है। इंसाफ सबके लिए, लेकिन समय के साथ। अगर आपका भी ऐसा विवाद है, तो वकील से बात करो। पुरानी डायरी निकालो, सच्चाई सामने आ जाएगी। कानून इंसानियत सिखाता है – हक लो, लेकिन सही जगह 

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indsocplantationcrops

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