
सुप्रीम कोर्ट ने विधवा महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि एक विधवा बहू के पास भरण-पोषण का कोई अन्य साधन नहीं है, तो वह अपने ससुर की संपत्ति से हिस्सा पाने और गुजारा भत्ता प्राप्त करने की कानूनी हकदार है।
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कानून और अधिकार: क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
शीर्ष अदालत ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 की धारा 19 का हवाला देते हुए यह व्यवस्था दी है। कानून के मुताबिक, एक विधवा बहू अपने ससुर से तब भरण-पोषण की मांग कर सकती है जब:
- वह अपने पति की संपत्ति से गुजारा करने में असमर्थ हो।
- उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत न हो।
- उसके माता-पिता या बच्चे उसका खर्च उठाने में सक्षम न हों।
पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी पर स्पष्टता
कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि यदि संपत्ति पैतृक (Ancestral) है, तो विधवा बहू अपने दिवंगत पति के हिस्से पर दावा कर सकती है, हालांकि, ससुर की ‘स्व-अर्जित’ (Self-acquired) संपत्ति के मामले में, बहू का अधिकार मुख्य रूप से भरण-पोषण और ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ (साझा घर) में रहने तक सीमित रहता है।
निवास का अधिकार और सुरक्षा
घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत, न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया है कि विधवा बहू को उसके ससुराल के घर से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता, भले ही घर ससुर के नाम पर हो, बहू को वहां रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
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पुनर्विवाह की शर्त
कानून के अनुसार, भरण-पोषण का यह अधिकार तब तक प्रभावी रहता है जब तक महिला पुनर्विवाह नहीं कर लेती, पुनर्विवाह के पश्चात, पिछले ससुराल की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा समाप्त हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय समाज के उस वर्ग के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जहाँ पति की मृत्यु के बाद महिलाओं को बेसहारा छोड़ दिया जाता था, इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक और पारिवारिक सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल नैतिक ही नहीं, बल्कि एक अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी है।

















