
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के लिव-इन पार्टनर्स और उनसे पैदा हुए बच्चों को पारिवारिक पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे में शामिल करने पर विचार करे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी ने अपने सेवाकाल के दौरान अपने संबंधों के बारे में पारदर्शिता रखी है, तो इसे “गंभीर दुराचार” (Grave Misconduct) नहीं माना जा सकता।
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मामले की मुख्य जानकारी
- अदालत का निर्णय: जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की पीठ ने कहा कि केवल विवाह के औपचारिक प्रमाण की कमी के आधार पर किसी पार्टनर को पेंशन अधिकारों से वंचित करना गलत है।
- पारदर्शिता को दी महत्ता: कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 40 वर्षों से अधिक समय तक अपनी लिव-इन पार्टनर के साथ रहने की बात विभाग से कभी नहीं छिपाई थी। इसलिए, उनके नाम को पेंशन भुगतान आदेश (PPO) में शामिल करने की कोशिश को धोखाधड़ी नहीं कहा जा सकता।
- CAT के आदेश को पलटा: हाई कोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के 2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कर्मचारी की 50% पेंशन और ग्रेच्युटी रोकने के फैसले को सही ठहराया गया था।
- ब्याज सहित भुगतान का निर्देश: अदालत ने केंद्र को रोकी गई 50% राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ जारी करने का आदेश दिया है।
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सामाजिक और कानूनी प्रभाव
यह फैसला बदलते सामाजिक परिवेश में लिव-इन संबंधों को प्रशासनिक कानून के तहत और मजबूती प्रदान करता है, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में उन महिलाओं और आश्रितों को सुरक्षा मिलेगी जो लंबे समय तक बिना विवाह के साथ रह रहे हैं।

















