
बॉम्बे हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है, अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला किसी ऐसे पुरुष के साथ लिव-इन में रहती है जो पहले से शादीशुदा है, तो उनके संबंध को कानूनी रूप से ‘विवाह’ या ‘विवाह की प्रकृति’ (nature of marriage) वाला नहीं माना जा सकता।
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क्या है पूरा मामला?
यह फैसला एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें उसने एक विवाहित पुरुष के साथ लंबे समय तक रहने के आधार पर पत्नी के समान अधिकारों और सुरक्षा की मांग की थी, महिला का तर्क था कि वे पति-पत्नी की तरह रह रहे थे, इसलिए उसे घरेलू हिंसा अधिनियम और अन्य कानूनों के तहत राहत मिलनी चाहिए।
अदालत की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
- कानूनी बाधा: कोर्ट ने कहा कि जब पुरुष पहले से ही कानूनी रूप से विवाहित है, तो किसी दूसरी महिला के साथ उसका रिश्ता ‘शादी’ की श्रेणी में नहीं आ सकता, कानून के अनुसार, दूसरी शादी या ऐसा कोई भी संबंध तब तक वैध नहीं है जब तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म न हो जाए।
- घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (DV Act) केवल उन लिव-इन संबंधों को सुरक्षा देता है जो ‘शादी की प्रकृति’ के होते हैं। चूंकि यहां पुरुष पहले से शादीशुदा था, इसलिए महिला इस कानून के तहत लाभ पाने की हकदार नहीं है।
- नैतिकता बनाम कानून: कोर्ट ने दोहराया कि लिव-इन में साथ रहने मात्र से ही कोई रिश्ता कानूनी विवाह नहीं बन जाता, खासकर तब जब पार्टनर पहले से किसी वैध वैवाहिक बंधन में बंधा हो।
इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि विवाहित व्यक्तियों के साथ लिव-इन संबंधों को कानूनी सुरक्षा मिलना कठिन है, बॉम्बे हाई कोर्ट के इस रुख से उन मामलों में कानूनी स्थिति और साफ हो गई है जहां लिव-इन पार्टनर अपनी कानूनी स्थिति को लेकर भ्रम में रहते हैं।

















