भाई के नाम रिकॉर्ड या संपत्ति गिरवी रखने से नहीं खत्म होगा बहन का हिस्सा! पैतृक संपत्ति पर मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

राजस्व रिकॉर्ड या गिरवी से बेटी का पैतृक हक नहीं छिनेगा। भाई की बिक्री रद्द, निचली अदालत बुरी तरह हारी! क्या आपकी बहन को भी चुप रहना पड़ेगा? पूरी सच्चाई जानिए अभी।

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मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि भाई के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड दर्ज होना या संपत्ति को गिरवी रखना ही बहन को पैतृक संपत्ति से बाहर नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि सह-वारिस का कब्जा पूरे परिवार के लिए माना जाता है, जब तक दूसरे वारिस के अधिकार का साफ-साफ इंकार न हो। इस फैसले ने बेटियों के हक को मजबूत किया है और भाई द्वारा की गई संपत्ति बिक्री को उसके हिस्से पर अमान्य घोषित कर दिया।

भाई के नाम रिकॉर्ड या संपत्ति गिरवी रखने से नहीं खत्म होगा बहन का हिस्सा! पैतृक संपत्ति पर मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

विवाद की शुरुआत

यह मामला तमिलनाडु के एक किसान परिवार से जुड़ा है, जहां पिता की 1968 में बिना वसीयत मौत हो गई। उनके पीछे पत्नी, बेटा और बेटी बराबर के वारिस थे। मां की 2012 में मौत के बाद बेटे ने बिना बहन की सहमति के पूरी संपत्ति बेच दी। बहन ने इसके खिलाफ कोर्ट में विभाजन का केस दायर किया, लेकिन निचली अदालत ने इसे खारिज कर दिया। अपील पर हाईकोर्ट ने निचले फैसले को पलट दिया।

बहन के पक्ष में दलीलें

बहन ने तर्क दिया कि मां और भाई का कब्जा परिवार के सभी सदस्यों की ओर से था, न कि उसके खिलाफ। भाई की बिक्री धोखे से की गई, इसलिए उसके हिस्से पर शून्य है। शादी के बाद ससुराल जाने से अधिकार नहीं छिनता, खासकर जब कोई स्पष्ट अस्वीकार न हुआ हो।

भाई के बचाव के तर्क

भाई ने कहा कि बहन 1962 में शादी करके चली गई थी और 50 साल से संपत्ति का इस्तेमाल नहीं किया। उसने टैक्स भरा, गिरवी रखी और लंबे कब्जे से अधिकार हासिल कर लिया। संपत्ति पैतृक होने और खरीदार के सद्भावी होने का हवाला दिया।

कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक सह-वारिस का कब्जा सभी के हित में होता है। राजस्व रिकॉर्ड या गिरवी जैसे कदम संयुक्त कब्जे को नहीं तोड़ते। ग्रामीण परिवारों में पुरुष सदस्यों के नाम पर दस्तावेज होना आम है, लेकिन यह बहन के हक को प्रभावित नहीं करता। प्रतिकूल कब्जे की दलील इसलिए खारिज हुई क्योंकि भाई ने कभी बहन को प्रत्यक्ष रूप से अधिकार नकारा नहीं। 2005 के हिंदू उत्तराधिकार कानून से पहले की मौत पर भी बेटी को बराबर हक है।

अंतिम फैसला क्या था

हाईकोर्ट ने निचला फैसला रद्द कर बहन को संपत्ति का आधा हिस्सा दिया। भाई की बिक्री उसके हिस्से पर बाध्यकारी नहीं। पक्षकारों के रिश्ते को देखते हुए खर्च पर कोई आदेश नहीं दिया। जस्टिस आर. शक्तिवेल ने अपील संख्या 712 ऑफ 2017 में यह फैसला सुनाया।

बेटियों के लिए नया संदेश

यह फैसला ग्रामीण भारत में संपत्ति विवादों को नई दिशा देता है। लंबे समय का कब्जा या दस्तावेज बहन के अधिकार छीनने का बहाना नहीं बन सकते। बेटियां अब बिना हिचकिचाहट दावा कर सकती हैं, जो परिवारों में समानता लाएगा।

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indsocplantationcrops

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