उत्तर प्रदेश का बहुप्रतीक्षित गंगा एक्सप्रेसवे अब किसानों की मुआवजा बढ़ोतरी की मांग पर ठहर गया है। मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह विशालकाय हाईवे परियोजना विकास की नई लहर लाने वाली थी, लेकिन भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों का गुस्सा काम की रफ्तार पर ब्रेक लगा रहा है। कई जिलों में धरने और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं, जिससे उद्घाटन की समयसीमा पर संकट मंडरा रहा है।

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प्रोजेक्ट की भव्यता और महत्व
यह 594 किलोमीटर लंबा 6 लेन वाला ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे राज्य को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। कुल लागत 37,000 करोड़ रुपये से अधिक होने वाली इस परियोजना में भूमि अधिग्रहण पर ही 9,500 करोड़ का बोझ है। यात्रा का समय घटकर महज 6 घंटे रह जाएगा, जहां 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से वाहन दौड़ सकेंगे। इससे न केवल यात्रा सुगम होगी, बल्कि औद्योगिक गलियारों और रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। जेवर एयरपोर्ट से कनेक्टिविटी इसे और मजबूत बनाएगी।
किसानों का आक्रोश, क्यों फंसा अधिग्रहण?
किसान सर्किल रेट से कहीं अधिक बाजार मूल्य पर मुआवजा मांग रहे हैं। प्रति बीघा 27 लाख रुपये की पेशकश को वे नाकाफी बता रहे हैं और 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक की बात कर रहे हैं। अमरोहा, प्रयागराज, गाजियाबाद, उन्नाव जैसे इलाकों में महापंचायतें हो रही हैं।
एक तरफ राष्ट्रीय राजमार्गों के बराबर दर की मांग, तो दूसरी तरफ औद्योगिक कॉरिडोर के लिए असमान मुआवजे का आरोप। गाजियाबाद के तलहेटा जैसे गांवों में सर्विस रोड निर्माण से खेतों की पहुंच बंद होने से किसान अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। कई जगहों पर जमीन देने के बाद भी भुगतान में देरी ने आग में घी डाल दिया।
निर्माण की मौजूदा स्थिति
परियोजना 93 से 99 प्रतिशत तक पूरी हो चुकी है। दिसंबर के अंत में ट्रायल रन और जनवरी 2026 में उद्घाटन की योजना थी, लेकिन अधिग्रहण वाले गांव जैसे सोरांव, पूरबनारा में काम रुका पड़ा है। हापुड़ और फर्रुखाबाद में भी लिंक एक्सप्रेसवे पर विवाद उफान पर है। किसानों का कहना है कि बिना उचित मुआवजे के वे जमीन नहीं देंगे, जिससे ठेकेदार परेशान हैं।
आगे का रास्ता, बातचीत ही समाधान?
सरकार ने किसानों से संवाद के निर्देश जारी किए हैं। बाजार दर पर चार गुना या आठ गुना बढ़ोतरी संभव है, ताकि विवाद सुलझे। इससे न केवल प्रोजेक्ट समय पर पूरा होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। किसान संगठनों को आश्वासन दिया जा रहा है कि उनकी चिंताओं का समाधान निकाला जाएगा। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो शुभारंभ में देरी निश्चित है। यह टकराव विकास और किसान हित के बीच संतुलन का सवाल बन गया है। क्या सरकार मांगें मान लेगी या किसान झुकेंगे? आने वाले दिन इसका जवाब देंगे।

















