आपके जेब या बटुए में जो सबसे छोटा नोट पड़ा रहता है, वो ₹1 का नोट है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि ये नोट भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की प्रेसों से नहीं निकलता। ये सीधे भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के जिम्मे है, जो इसे छापता और जारी करता है। अब सोचिए, बाकी सारे नोट RBI के कंट्रोल में क्यों हैं, लेकिन ये एक अपवाद क्यों?

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खास नोट का खास राज
₹1 नोट को देखिए तो सबसे बड़ा फर्क साफ दिखता है। बाकी नोटों पर RBI गवर्नर के हस्ताक्षर और ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की मुहर होती है, लेकिन यहां वित्त सचिव के साइन हैं। ये नोट सरकार की सीधी गारंटी पर चलता है, जैसे कोई पुराना कोइन। कानूनी तौर पर इसे सिक्के की तरह ही माना जाता है, भले कागज का हो। इसी वजह से RBI का इसमें कोई एकाधिकार नहीं।
इतिहास में छिपा ये रहस्य
ये परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है। 1917 में पहली बार ₹1 नोट छपा, जब RBI का अस्तित्व ही नहीं था। आजादी के बाद भी ये प्रथा बनी रही। RBI एक्ट 1934 की धारा 22 कहती है कि ₹2 से ऊपर के नोट RBI के पास हैं, लेकिन ₹1 को जानबूझकर बाहर रखा गया। 1940 में फिर शुरू हुआ, 1994 में रुका और 2015 में दोबारा चालू। बाजार में ये नोट कम दिखता है क्योंकि इसकी छपाई सीमित रहती है।
कैसे होता है प्रिंटिंग का कमाल
Nashik और Dewas की सरकारी प्रेसें, जो सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन के तहत हैं, यहीं ₹1 नोट बनाते हैं। RBI की अपनी प्रेसें जैसे मैसूर या सल्बोनी इनके लिए बंद रहती हैं। नोट छोटा सा है – 97 मिमी चौड़ा, 65 मिमी ऊंचा, 100% कॉटन का। रंग गुलाबी-हरा, ऊपर अनाज का डिजाइन और सागर सम्राट प्लेटफॉर्म की तस्वीर। 15 भाषाओं में वैल्यू लिखी होती है। RBI सिर्फ इसे बैंकों तक पहुंचाने में मदद करता है।
क्यों रखा गया ये अलग नियम
सरकार को छोटे नोटों पर कंट्रोल चाहिए था, ताकि अर्थव्यवस्था के निचले स्तर पर सीधी नजर रख सके। अगर RBI सब संभालता तो ये सिक्के जैसा प्राइमरी करेंसी का स्टेटस खो देता। बाकी नोटों पर RBI का वादा लिखा होता है – ‘मैं धारक को इतने रुपये अदा करूंगा’, लेकिन ₹1 पर ये क्लॉज नहीं। ये सरकार का वचन है। कभी-कभी ये नोट स्टेटस सिंबल बन जाता है, लोग इकट्ठा करके रखते हैं।
अगली बार जब बटुआ निकालें तो ₹1 नोट को दोबारा देखें। ये छोटा सा कागज बड़ा राज छिपाए है। क्या आपने कभी नोटिस किया था?

















